अर्जुन का कर्म-ज्ञान प्रश्न: भगवद् गीता अध्याय 3, श्लोक 1

भगवद गीता अध्याय 3, श्लोक 1


🕉️ संस्कृत श्लोक

अर्जुन उवाच ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन। तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव।।

📝 लिप्यंतरण (Transliteration)

arjuna uvāca jyāyasī cet-karmaṇas te matā buddhir janārdana tat kiṁ karmaṇi ghore māṁ niyojayasi keśava

🌟 हिंदी अनुवाद

अर्जुन बोले – हे जनार्दन! यदि आपकी मति में ज्ञान, कर्म से श्रेष्ठ है, तो फिर हे केशव! मुझे इस भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं?


💭 व्याख्या (Commentary)

📖 संदर्भ

अर्जुन युद्ध के आरम्भ से पहले कृष्ण से मार्गदर्शन माँगते हैं। श्लोक 1 में वह यह जानना चाहते हैं कि यदि कर्म ही सर्वोच्च है तो क्यों उन्हें भयभीत कर्म करने का आग्रह किया जा रहा है।

🔍 विस्तृत व्याख्या

यह श्लोक कर्म और ज्ञान की द्वंद्वता पर एक गहरा प्रश्न उठाता है। अर्जुन को संदेह होता है कि यदि कर्म श्रेष्ठ है, तो उसे बिना किसी डर के कार्य करना चाहिए। कृष्ण इस प्रश्न से यह दिखाते हैं कि कर्म का वास्तविक अर्थ केवल बाहरी क्रिया नहीं बल्कि उसका दृष्टिकोण और उद्देश्य है। ज्ञान (बुद्धि) वह साधन है जिसके द्वारा हम सही कर्म का चयन करते हैं; इसलिए ज्ञान विना कर्म अनिश्चित और भयभीत होता है। अतः सत्य कर्म तभी श्रेष्ठ है जब वह ज्ञान के प्रकाश में हो, जहाँ कर्मकर्ता अपने कर्तव्य को निस्वार्थ रूप से निभाता है।

🌱 व्यावहारिक अनुप्रयोग

आधुनिक जीवन में यह हमें सिखाता है कि किसी भी कार्य को करने से पहले उसके उद्देश्य और परिणाम पर ध्यान दें। यदि आप किसी परियोजना या नौकरी के लिए प्रयासरत हैं, तो उसे अपने मूल्यों और दीर्घकालिक लक्ष्यों के अनुरूप चुनें, ताकि वह भयमुक्त और संतोषजनक हो जाए।


✨ मुख्य सीख (Key Takeaway)

सही कर्म वही है जो ज्ञान के प्रकाश में निस्वार्थ रूप से किया जाता है; तभी वह वास्तव में श्रेष्ठ होता है।

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